खेल

प्रकार : -कहानी
पात्र :- 1.मनोहर
2.सुरबाला

मुख्य कहानी

मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुकास्थल पर एक बालक और बालिका, अपने आप को और सारे विश्व को भूल, गंगा-तट के बालू और पानी को अपना एकमात्र आत्मीय बना उनसे  खिलवाड़ कर रहे थे।

प्रकृति इन निर्दोष परमात्म-खण्डों को निस्तब्ध और निर्निमेष निहार रही थी। बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को छटाछट उछाल रहा था। पानी मानो चोट खाकर भी बालक से मित्रता जोड़ने के लिए विह्नल हो उछल रहा था। बालिका अपने एक पैर पर रेत जमाकर और थापकर एक भाड़ बना रही थी।

बनाते-बनाते बालिका भाड़ से बोली- "देख ठीक नहीं बना, तो मैं तुझे फोड़ दूंगी।" फिर बड़े प्यार से थपका थपकाकर उसे ठीक करने लगी। सोचती जाती थी- "इसके ऊपर मैं एक कुटी बनाउंगी, वह मेरी कुटी होगी। और मनोहर ? नहीं, वह कुटी में नहीं रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ में पत्ते झोंकेगा। जब वह हार जाएगा, बहुत कहेगा, तब मैं उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूंगी।

मनोहर उधर पानी से हिल मिलकर खेल रहा था। उसे क्या मालूम कि यहाँ अकारण ही उस पर रोष और अनुग्रह किया जा रहा है।

बालिका सोच रही थी- "मनोहर कैसा अच्छा है, पर वह दंगई बड़ा है। हमें छेड़ता ही रहता है। अब के दंगा करेगा तो हम उसे कुटी में साझी नहीं करेंगे। साझी होने को कहेगा, तो उससे शर्त करवा लेंगे तब साझी करेंगे।‘

बालिका सुरबाला सातवें वर्ष में थी। मनोहर कोई दो साल उससे बड़ा था।

बालिका को अचानक ध्यान आया- ‘भाड़ की छत तो गरम होगी। उस पर मनोहर रहेगा कैसे ? मैं तो रह जाउंगी, पर मनोहर बेचारा कैसे सहेगा ?' फिर सोचा-'कह उससे मैं कह दूँगी - भई छत बहुत तप रही है, तुम जलोगे, तुम मत आओ। पर अगर वह नहीं माना ? मेरे पास होने को वह आया ही, तो मैं कहूँगी- भई ठहरो, मैं ही बाहर आती हूं। पर वह मेरे पास आने की जिद करेगा क्या....? जरूर करेगा, वह बड़ा हठी है। पर मैं उसे आने नहीं दूँगी। बेचारा तपेगा.... भला कुछ ठीक है। ज्यादा कहेगा, तो मैं धक्का दे दूँगी और कहूँगी- 'अरे, जल जाएगा मूर्ख !' यह सोचने पर उसे बड़ा मजा-सा आया, पर उसका मुंह सूख गया। उसे मानो सचमुच ही धक्का खाकर मनोहर के गिरने का अद्भुत और करुण दृश्य घटित की भांति प्रत्यक्ष हो गया ।

बालिका ने दो-एक पक्के हाथ भाड़ पर लगाकर देखा। भाड़ अब बिलकुल बन गया है । माँ जिस सतर्क सावधानी के साथ अपने को हटाकर नवजात शिशु को बिछौने पर लेटा छोड़ती है, वैसे ही सुरबाला ने अपना पैर धीरे-धीरे भाड़ के नीचे से खींचना शुरू किया। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे। इस क्रिया में वह सचमुच भाड़ को पुचकारती-सी जाती थी । उसके पांव ही पर तो भाड़ टिका है, उसी का आश्रय हट जाने पर बेचारा कहीं टूट न पड़े। पैर साफ निकालने पर भाड़ जब ज्यों का त्यों टिका रह गया, तब बालिका एक बार आह्लाद से नाच उठी ।

बालिका एकबारगी ही मनोहर को इस अलौकिक कारीगरी वाले भाड़ के दर्शन के लिए दौड़कर खींच लाने को उद्यत हो गई। मूर्ख लड़का पानी से उलझ रहा है। यहां कैसी जबरदस्त कारगुजारी हुई है, सो नहीं देखता। ऐसा पक्का भाड़ उसने कहीं देखा भी है।

पर सोचा- 'अभी नहीं, पहले कुटी तो बना लूं।' यह सोचकर बालिका ने रेत की एक चुटकी ली और बड़े हौले से भाड़ के सिर पर छोड़ दी । फिर दूसरी, फिर तीसरी, फिर चौथी। इस प्रकार चार चुटकी रेत धीरे-धीरे छोड़कर सुरबाला ने भाड़ के सिर पर अपनी कुटी तैयार कर ली।

भाड़ तैयार हो गया। पर पड़ोस का भाड़ जब बालिका ने पूरा-पूरा याद किया तो पता चला, एक कमी रह गई- धुँआ कहाँ से होकर निकलेगा ? तनिक सोचकर उसने एक सींक टेढ़ी करके उसके शीर्ष पर गाड़ दी । बस ब्रह्मांड की सबसे संपूर्ण संपदा और विश्व की सबसे सुंदर वस्तु तैयार हो गई।

वह उस समय उजड्ड मनोहर को इस अपूर्व स्थापत्य का दर्शन कराएगी, पर अभी जरा थोड़ा देख तो ले और। सुरबाला मुँह बाए आँखें स्थिर करके इस भाड़-श्रेष्ठ को देख देखकर विस्मित और पुलकित होने लगी । परमात्मा कहां विराजते हैं, कोई बाला से पूछे, तो वह बताए इस भाड़ के जादू में।

मनोहर अपनी सुरी-सरो-सुर्री की याद कर पानी से नाता तोड़ हाथ की लकड़ी को भरपूर जोर से गंगा की धारा में फेंककर जब मुड़ा, तब श्री सुरबाला देवी एकटक अपनी परमात्म लीला के जादू को बूझने और सराहने में लगी हुई थी।

मनोहर ने बाला की दृष्टि का अनुसरण कर देखा- देवीजी बिलकुल अपने भाड़ में अटकी हुई है। उसने जोर से कहकहा लगाकर एक लात में भाड़ का काम तमाम कर दिया।

न जाने क्या किला फतह किया हो, ऐसे गर्व से भरकर निर्दयी मनोहर चिल्लाया- "सुर्रो रानी !"

सुर्रो रानी मूक खड़ी थी। उनके मुँह पर जहां अभी परम विशुद्ध रस था, वहां एक शून्य फैल गया । रानी के सामने साक्षात् स्वर्ग आ खड़ा हुआ था। वह उसी के हाथों का बनाया हुआ था और वह किसी एक को उसकी एक एक मनोरमता और स्वर्गीयता का दर्शन करना चाहती थी। हा, हंत ! वही व्यक्ति आया और उसने अपनी लात से उसे तोड़-फोड़ डाला ! रानी हमारी बड़ी व्यथा से भर गई।

हमारे विद्वान पाठकों में से कोई होता, तो उन मूर्खों को समझाता- संसार क्षण-भंगुर है। इसमें दुख क्या और सुख क्या ! जो जिससे बना है , वह उसी में लय हो जाना है। इसमें शोक और उद्वेग की क्या बात है ? यह संसार जल का बुलबुला है, फूटकर एक समय जल में ही खो जाना उसकी सार्थकता है। जो इतना नहीं समझते, वे वृथा हैं। री, मर्ख लड़की, तू समझ ! सब ब्रह्मांड ब्रह्ममय है। उसी में लीन हो जाने के अर्थ है। इससे तू किसलिए व्यर्थ व्यथा सह रही है ? रेत का तेरा भाड़ तेरा कुछ था भी ? मन का तमाशा था। बस हुआ, और लुप्त हो गया। रेत में से होकर रेत में मिल गया। इस पर खेद मत कर, इससे शिक्षा ले। जिसने लात मारकर तोड़ा है, वह तो परमात्मा का साधन मात्र है। परमात्मा तुझे गंभीर शिक्षा देना चाहते हैं। लड़की, तू मूर्ख क्यों बनती है ? परमात्मा की इस शिक्षा को समझ और उस द्वारा उन तक पहुंचने का प्रयास कर, आदि-आदि ।

पर बेचारी बालिका का दुर्भाग्य, कोई विज्ञ धीमान् पंडित तत्वोप्देश के लिए उस गंगा तट पर नहीं पहुंच सके। हमें यह भी संदेह है कि सुर्री एकदम इतनी जड़ मूर्खा है कि यदि कोई परोपकाररत पंडित परमात्म-निर्देश से वहाँ पहुँचकर उपदेश देने भी लगते, तो वह उनकी बात को समझती तो क्या , सुनती तक नहीं। शायद मुँह बिचकाए रहती। पर, अब तो बहन निर्बुद्धि, शठ मनोहर के सिवा कोई नहीं है, और मनोहर विश्वतत्व की एक भी बात नहीं जानता। उसका मन न जाने कैसा हो रहा है ? जैसे कोई उसे भीतर-ही-भीतर मसोसकर निचोड़ डाल रहा है लेकिन उसने बनकर कहा, "सुर्री, दुत्त पगली ! रूठती है ?"

सुरबाला वैसे ही खड़ी रही।

"सुर्री, रूठती क्यों है ? '

बाला तनिक न हिली।

"सुरी! सुरी! - ओ सुरी"

अब बनना न हो सका । मनोहर की आवाज हठात् कंपी सी निकली।

सुरबाला अब और मुंह फेरकर खड़ी हो गई। स्वर के इस कंपन का सामना शायद उससे न हो सका।

"सुरी- ओ सुरिया! मैं मनोहर हूँ- मनोहर। मुझे मारती नहीं ?'

यह मनोहर ने उसके पीठ पीछे से कहा और ऐसे कहा, जैसे वह यह प्रकट करना चाहता है कि वह रो नहीं रहा है।

"हम नहीं बोलते।'' बालिका से बिना बोले रहा न गया। उसका भाड़ शायद शून्य में विलीन हो गया। उसका स्थान और सुरबाला की सारी दुनिया का स्थान, कांपती हुई मनोहर की आवाज ने ले लिया।

मनोहर ने बड़ा बल लगाकर कहा, "सुरी, मनोहर तेरे पीछे खड़ा है। वह बड़ा दुष्ट है। बोल मत, पर उस पर रेत क्यों नहीं फेंक देती, मार क्यों नहीं देती ? उसे एक थप्पड़ लगा-वह अब कभी कसूर नहीं करेगा।"

बाला ने कड़ककर कहा, ''चुप रहो जी !'

"चुप रहता हूँ, पर मुझे देखोगी भी नहीं ?"

"नहीं देखती।"

"अच्छा मत देखो। मत ही देखो। मैं अब कभी सामने न आऊँगा, मैं इसी लायक हूं।"

"कह दिया तुमसे, तुम चुप रहो। हम नहीं बोलते।'' बालिका में व्यथा और क्रोध कभी का खत्म हो चुका था। वह तो पिघलकर बह चुका था। यह कुछ और ही भाव था। यह एक उल्लास था जो ब्याजकोप का रूप धर रहा था। दूसरे शब्दों में यह स्त्रीत्व था।

मनोहर बोला, ''लो सुर्री, मैं नहीं बोलता। में बैठ जाता हूँ। यहीं बैठा रहूँगा। तुम जब तक न कहोगी, न उठूँगा, न बोलूँगा।'

मनोहर चुप बैठ गया। कुछ क्षण बाद हारकर सुरबाला बोली, ''हमारा भाड़ क्यों तोड़ा जी ? हमारा भाड़ बना के दो।"

"लो अभी लो।"

"हम वैसा ही लेंगे।"

"वैसा ही लो, उससे भी अच्छा।'

"उस पै हमारी कुटी थी, उस पै धुएं का रास्ता था।"

"लो, सब लो। तुम बताती जाओ, मैं बनाता जाऊं।"

"हम नहीं बताएंगे। तुमने क्यों तोड़ा ? तुमने तोड़ा, तुम्हीं बनाओ !"

"अच्छा, पर तुम इधर देखो तो !"

"हम नहीं देखते, पहले भाड़ बना के दो।"

मनोहर ने तभी खुशी-खुशी एक भाड़ बनाकर तैयार किया। कहा, ''लो, भाड़ बन गया।"

"बन गया ?"

"हां।"

'धुएँ का रास्ता बनाया ? कुटी बनाई ?"

"सो कैसे बनाऊं-बताओ तो।'

"पहले बनाओ, तब बताऊंगी।"

भाड़ के सिर पर एक सींक लगाकर और एक-एक पत्ते की ओट लगाकर कहा, ''बना दिया।"

तुरंत मुड़कर सुरबाला ने कहा, ''अच्छा दिखाओ।"

"सींक ठीक नहीं लगी जी'', ''पत्ता ऐसे लगेगा'' आदि-आदि संशोधन कर चुकने पर मनोहर को हुकुम हुआ-

"थोड़ा पानी लाओ, भाड़ के सिर पर डालेंगे।"

मनोहर पानी लाया।

गंगाजल से कर-पात्रों द्वारा वह भाड़ का अभिषेक करना ही चाहता था कि सुरा रानी ने एक लात से भाड़ के सिर को चकनाचूर कर दिया।

सुरबाला रानी हंसी से नाच उठी। मनोहर उत्फुल्लुता से कहकहा लगाने लगा। उस निर्जन प्रांत में वह निर्मल शिशु-हास्य-रव लहरें लेता हुआ व्याप्त हो गया। सूरज महाराज बालकों जैसे लाल-लाल मुँह से गुलाबी-गुलाबी हँसी हँस रहे थे। गंगा मानो जान-बूझकर किल्कारियाँ मार रही थी।

और-और वे लंबे ऊँचे-ऊँचे दिग्गज पेड़ दार्शनिक पंडितों की भांति हास्य की सार शून्यता पर मानो मन-ही-मन गंभीर तत्वालोचन कर हँसी में भूले हुए मूर्खों पर थोड़ी दया बक्शना चाह रहे थे।

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